Thursday, 12 March 2026

OF BELIEFS.

Rational, Irrational, Inherent and Acquired.

पिछले दिनों में  blogger  में अपने सभी खास खास ब्लॉगपोस्ट में विदा कह चुका हूँ, लेकिन लगता है इस ब्लॉग में अभी कुछ लिखा जा सकता है। इसलिए यह

अंतिम पोस्ट!

सनातन धर्म के माननेवाले अधिकांश लोग यह मानते हैं कि धर्म और अधर्म की पहचान की सर्वाधिक प्रामाणिक कोई कसौटी यदि है तो वह श्रीमद्भगवद्गीता ही  है।

संक्षेप में गीता की विषय-वस्तु और सार-कथा यह है -

कुरुक्षेत्र में महाभारत के युद्ध के प्रारंभ में युधिष्ठिर के छोटे भाई अर्जुन उनके मित्र और उनके रथ के सारथी श्रीकृष्ण के साथ रणक्षेत्र में पहुँचे तो अत्यंत भावविह्वल हो उठे। भले ही दुनिया भर के राजनेता न देख सकें, मूढ से मूढ और अत्यन्त मूर्ख कहे जानेवाले व्यक्ति के लिए भी यह समझ सकना आसान है कि युद्ध  कितनी बड़ी और भयावह, अंतहीन और अमानवीय त्रासदी है, और इससे पूरी दुनिया ही तबाह हो सकती है। और फिर युद्ध में उनके सामने वे ही सब लोग थे,  - उनके कुल और परिवार के उनके प्रिय लोग जो अपने

कर्तव्य से प्रेरित होकर अपने प्राणों की बलि दे देने के लिए और अपने सामने खड़े प्रतिद्वंद्वी के प्राण लेने के लिए कमर कस कर तैयार खड़े थे।

अर्जुन इस सामूहिक, निरर्थक आत्महत्या की विडम्बना को देख रहा था और यद्यपि उसे अपने जीवन और प्राणों की रंचमात्र भी चिन्ता नहीं थी, लेकिन उन अपने लोगों की चिन्ता से वह बहुत व्याकुल हो उठा था। वह तो कह रहा था कि अपने स्वजनों की हत्या कर उनके खून से सिक्त राज्य और भूमि का उपभोग करने से बेहतर तो यही होगा कि भिक्षा से जीवन बिताकर अपनी आयु पूरी कर ली जाए, या यदि वे चाहें तो मुझ निःशस्त्र को ही मार डालें।

तब श्रीकृष्ण ने उन्हें उनकी इस दुविधा के बारे में यह स्पष्ट किया कि तुम्हारे अकेले के जीने या मर जाने से युद्ध को टाला जाना संभव नहीं है। क्योंकि मनुष्य की सामूहिक मानसिकता ही मनुष्य की सामूहिक नियति है और इसलिए तुम जीते रहो या मर जाओ, दूसरे लोगों के लिए इसका कोई महत्व नहीं है। और तुम जो स्वयं अपने आपको स्वतंत्र कर्ता मान रहे हो यह भी तुम्हारा बहुत बड़ा वहम है। क्योंकि औरों की ही तरह तुम भी समष्टि  प्रकृति का एक यंत्रमात्र हो और प्रकृति ही तुम्हें बलपूर्वक उस कार्य में संलग्न कर देगी जिसे तुम चाहकर या न चाहते हुए भी करोगे ही। 

श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 2 के 9 वें और अध्याय 18 के 59 वें निम्नलिखित दो श्लोकों में इस ग्रन्थ की पूरी कथा इस प्रकार से वर्णित है -

एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप।

न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह।।९।।

और,

यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे।

मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति।।५९।।

अध्याय 2 से अध्याय 17 तक श्रीकृष्ण निष्ठा और श्रद्धा क्या है इस बारे में विवेचना करते हैं। और आगे कहते हैं कि किसी भी मनुष्य के मन में मौलिक द्वन्द्व भाग्य और कर्म के संबंध में होता है। यद्यपि भाग्य का अर्थ है नियति - वह सब जो कि घटित होता है लेकिन कर्म वह उपाय है जो मनुष्य के हाथ में होता है जिसकी सहायता से शायद वह अपने भाग्य को बदल सकता है।

मनुष्य की इन दोनों मान्यताओं को ही निष्ठा कहा जाता है। इस बीच समष्टि-अस्तित्व के किसी नियामक और नियंता के अस्तित्वमान होने या न होने की मान्यता जन्म लेती है जिसे विश्वास  या कल्पनामात्र समझा जाता है। इस नियामक और नियंता को ही ईश्वर या ऐसा ही कोई अन्य नाम दिया जाता है। जो इस प्रकार के किसी ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास करते हैं उन्हें आस्तिक, और जो ऐसे किसी ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास नहीं करते उन्हें नास्तिक या संदेहवादी कहा जाता है। शायद अज्ञेयवाद भी संदेहवाद का ही एक और प्रकार है।

इन सभी विभिन्न मान्यताओं पर विश्वास करनेवाले यह तो मानते ही हैं कि यह संसार सत्य है क्योंकि संसार को ही असत्य कह दिए जाने पर तो कोई प्रश्न ही नहीं पैदा हो सकता है। तो फिर भी यह प्रश्न कि

सत्य क्या है? और इसे कैसे तय / परिभाषित किया जाए?

तो कुछ लोगों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि अधिकांश लोगों के लिए जीवन के तात्कालिक विषय और उनसे संबंधित प्रश्न अधिक महत्व रखते हैं। ईश्वर का होना या न होना तभी महत्वपूर्ण होता है जब ऐसा कोई ईश्वर वास्तव में किसी रूप में अनुभवगम्य भी हो। केवल अनुमानगम्य ईश्वर किस प्रकार हमारे किसी काम का हो सकेगा?

फिर कुछ लोग आत्मा नामक वस्तु को ही नित्य सत्य की तरह प्रत्यक्ष (Direct) और अपरोक्ष (im-mediate) बोधगम्य प्रमाण मानते हैं क्योंकि अपने अस्तित्व को हर कोई अनिवार्य और अपरिहार्य रूप से स्वीकार करता ही है और इसे हर कोई अनायास जानता भी है।

सांख्य दर्शन में इसी आधार पर पुरुष और प्रकृति को नित्य सत्य कहा जाता है। यही पुरुष "मैं" है जबकि प्रकृति "यह" है।

इस दर्शन में भी ईश्वर के होने या न होने का प्रश्न गौण और अप्रासंगिक भी हो जाता है इसलिए इसे कभी कभी "नास्तिक" दर्शन भी कह दिया जाता है। जिस चेतना में ये दोनों तत्व - पुरुष और प्रकृति अभिव्यक्त होते हैं और फिर विलीन भी होते रहते हैं, वह तत्व विषय-विषयी से विलक्षण है, बस इतना ही कह सकते हैं। वही वह ज्ञान है जिसमें पुरुष-प्रकृति का भेद नहीं रह जाता क्योंकि उसी ज्ञान में सब व्याप्त है और वही हममें व्याप्त है।

ईश्वर के अस्तित्व और महत्व को स्वीकार करनेवाले और अस्वीकार करनेवाले भी "मैं" क्या वस्तु है इस प्रकार की किसी वस्तु के अस्तित्व को मानते तो हैं और शायद उसे ही अहंकार या  ego  कहते हैं, किन्तु न तो उसे इंगित कर सकते हैं, और न ही उस वस्तु का विषयीकरण / objectification ही कर सकते हैं। तो  फिर किसी आत्मा या ईश्वर का विषयीकरण / objectification करना तो उनके लिए नितान्त असंभव ही है।

गीता में पुनः दो प्रकार की भाग्य और कर्म की निष्ठा के बारे में कहा गया जो हर किसी की बुद्धि को प्रेरित और संचालित करती है। और निष्ठा के अनुसार ही मनुष्यमात्र में प्रकृति के ही तीनों गुणों और उनके मिश्रण के अनुरूप सात्विक, राजसिक और तामसी गुणों से युक्त उसकी श्रद्धा होती है।

यह थोड़ा विचित्र है कि मनुष्य में किसी भी प्रकार की निष्ठा हो, किसी भी प्रकार की श्रद्धा हो, वह ईश्वरवादी या निरीश्वरवादी हो, भौतिकवादी, मनोविज्ञानवादी या अध्यात्मवादी हो, अपनी प्रकृति से परिचालित होता है।

दो दिनों पहले ही इस पर ध्यान गया कि हिंदी "मैं" के लिए प्रयुक्त तमिल् शब्द 

நான் और ஞாறம்

एक ही वास्तविकता "आत्मा" (स्व या स्वयं अपने-आप के ही लिए प्रयुक्त किए जाते हैं।

इसी प्रकार "तुम" के लिए प्रयुक्त तमिल् शब्द है -

நி

अहं ब्रह्मास्मि और तत् त्वम् असि

इसी सत्य का उद्घोष करते हैं। 

Bye! 

👋 

***


  

  

Friday, 22 August 2025

Salt Lake City.

एक जापानी कहानी

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बचपन में हमारी हिन्दी की पाठ्य-पुस्तक में पढ़ी थी। 

किसी गाँव में दो भाई अपने पिता के साथ रहते थे। वे गरीब लोग थे और मजदूरी आदि कर अपना पेट पालते थे। एक दिन अचानक पिता की मृत्यु हो गई। कुछ दिनों तक तो वे साथ रहे फिर बड़े भाई ने छोटे भाई को घर से निकाल दिया। छोटा भाई भूखा प्यासा जंगल में चला गया जहाँ एक नदी बहती थी। उसने नदी में पानी पिया और भूखा रोता हुआ बैठा रहा। उस जंगल की देवी जब  भ्रमण करते हुए वहाँ से गुजरी तो उसे उस पर दया आई और उससे पूछा कि तुम रो क्यों रहे हो? तब उसने कहा  "मुझे भूख लगी है।"

जंगल की देवी (शायद वही, जिसे प्रकृति भी कहा जाता है) ने उसे पत्थर की एक छोटी सी चक्की देकर कहा : इसे तीन बार दाँए घुमाकर जो भी चाहिए इससे माँग लो और जरूरत पूरी हो जाने पर एक बार बाँए घुमाकर रोक दो। छोटे भाई ने उससे अपनी जरूरत की वस्तुएँ प्राप्त कर लीं और सुख से रहने लगा।

बहुत दिनों बाद उसका बड़ा भाई वहाँ से गुजरा तो उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ। उसने देखा किस तरह उसका छोटा भाई चक्की से जो चाहे प्राप्त कर लेता है। उसने छोटे भाई से चक्की छीन ली और एक नाव में बैठकर वह गाँव छोड़कर जाने लगा। नाव में उसे भूख लगी तो पास रखा खाना खाने लगा। तब उसे नमक की जरूरत महसूस हुई तो उसने चक्की को तीन बार दाँए घुमाकर नमक मांगा लेकिन उसे यह नहीं पता था कि चक्की को बंद कैसे किया जाए। तब तक चक्की से इतनी तेजी से इतना अधिक नमक निकलने लगा कि वह नमक के ढेर के नीचे दबकर मर गया। नदी में डूबी नाव के साथ साथ बहता हुआ वह समुद्र में पहुँच गया। कहते हैं तब से उस चक्की से अब तक नमक निकल रहा है और इसीलिए समुद्र का पानी खारा होता जा रहा है।

जैसे समुद्र खारा होता जा रहा है वैसे ही तकनीक और  विज्ञान के विकास के साथ साथ धरती और दुनिया का वातावरण भी नमकीन और इतना खारा होता चला जा रहा है कि दुनिया में हर कोई त्रस्त और परेशान है।

दुनिया आज  Salt Lake City  होकर रह गयी है! 

*** 

Saturday, 16 August 2025

KAIVALYAM

प्रथम और अन्तिम 

समाधिपाद 

अथ योगानुशासनम्।।१।।

कैवल्यपाद 

पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति।।३४।।

(पाठान्तरम्--

पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तेरिति।।)

चित् स्वयं ही शक्ति है और उस शक्ति के ५२ धाम हैं, जिन्हें शक्तिपीठ कहा जाता है। इनमें से प्रत्येक तीन तरत् हार्द / Tarot Card / The flowing heart है। प्रत्येक तीन फलकों / planes / चित्रों से बना है - जैसे कैलिडोस्कोप / Kaleidoscope के तीन फलक होते हैं। चितिशक्ति के तीन अ-त्रिभूत (attributes) यही हैं। यही चित् रूपी अ-त्रि नामक ऋषि हैं, जिनकी अर्द्धांगिनी है अनसूया प्रकृतिः।

सूयते, न सूयते वा कश्चित् किमपि वा सा अन्-असूया इति। असूया-रहिता, रहसि स्थिता।

चतुर्दशः भुवनाः मनोमयाः।।

सा त्रिगुणात्मिका अनसूया सृजति चतुर्दश-भुवनात्मकं मनोमयं जगदिदम्।।

तस्याः हि द्विपञ्चाशतमात्मकानि धामानि एतानि तरत् हार्दानि  Tarot Cards.

अत्र एकैकं धाम वा शक्तिपीठं त्रिगुणात्मकम्।

इस प्रकार इस कलित / कालिका / कालिस्वरूपा शक्ति के प्रत्येक धाम में तीन तरत् हार्द / Tarot Card  होते हैं। जिनमें एक अधिष्ठान और दो अन्य (व्यक्त पुरुष तथा व्यक्त प्रकृति) होते हैं। यही जीव-भावरूपी जन्म-मरण भूख-प्यास, इच्छा तथा द्वेष युक्त चेतन अहंकार अर्थात् स्व है। शक्तिपीठ। जैसे चित्रात्मक तरत् हार्द या तालपत्रों से ताश के तीन पत्तों से रचित, अहंकार रूपी कोई एक स्वकीय जगत्। ऐसे १४ गुणित ३ अर्थात् ४२ हार्द सूत्रों और दशमहाविद्याओं से विरचित कुल ५२ चित्रों से बना यह संपूर्ण अस्तित्व सतत चिरस्थायी और चिरसामयिक प्रतीत होता है।

यही कालितो श्यप् प्रत्यय है। श्यप् प्रत्यय के प्रयोग में श् और प् का लोप होकर य शेष रहता है। श्यकः प-सयुजं श्कपः। तथा च  Kaleidoscope. 

यतो वा हि अस्मिञ्जगति यत्किञ्चन अनुभूयते। तत्रैव अनुभवमिदं प्रतीयते कश्चित् अनुभोक्तारुपेण।

इति हि कैवल्यम् ।

तरत्-हार्द तरद्धार्द स्मृतिः।।

पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा चितिशक्तिरिति।।

***

 



Monday, 4 August 2025

The way of knowledge.

 Is Like :

Walking upon the double-edged sword :

A I  is verily this -- double edged sword! 

असि-धार-व्रतं -- शिलायाः हृदयं च यत्! 

--

नेति नेति नेतीति शेषितं यत् परं पदम्। 

निराकर्तुमशक्यत्वात्तदस्मीति सुखी भव।। 

जडतां वर्जयित्वैतां शिलाया हृदयं च यत्। 

अमनस्कं महाबाहो तन्मयः भव सर्वदा।। 

--

न इति न इति न इति, इति शेषितं, यत् परं पदम्।

निराकर्तुम् अशक्यत्वात्, तत् अस्मि, इति सुखी भव।।

जडतां वर्जयित्वा एतां, शिलायाः हृदयं च यत्। 

अमनस्कं महाबाहो तन्मयः भव सर्वदा।।

--

गुरु पूर्णिमा के दिन तीन मित्र मिलने के लिए आए थे।

एक ने कहा -

माण्डूक्य उपनिषद्  की आनन्दगिरि टीका का अनुवाद सरल हिन्दी अर्थ में कर सकेंगे क्या!

दूसरे मित्र ने कहा -

जब ये सीधे ही माण्डूक्य उपनिषद् का सरल हिन्दी अर्थ कर सकते हैं तो किसी अन्य टीका का अर्थ और अनुवाद का परिश्रम क्यों किया जाए! 

अभी एक मित्र ने उपरोक्त दो श्लोकों का "सही अर्थ" क्या है, यह जानना चाहा तो मुझे याद आया।

शास्त्रज्ञान की यही मर्यादा है।

कोई दूसरा आपको जो शास्त्रज्ञान देता है उसे समझने के लिए बहुत धैर्य रखना और रुचि के साथ श्रम करना भी उतना ही आवश्यक होता है।

और इतना ही नहीं, फिर उसे प्रयोग भी करना होता है।

शास्त्रीय ज्ञान तो बौद्धिक भी हो सकता है,

और कंप्यूटर, ए आई की सहायता से,

उसकी विवेचना शायद और अधिक अच्छी तरह से कर सकता है।

इस सबमें बुद्धि का कार्य होता है जो बुद्धि तक ही सीमित रह जाता है। 

सैद्धांतिक दृष्टि से आप संतुष्ट हो भी सकते हैं या शायद न भी हो सकें। बुद्धि का अधिक प्रयोग थका भी सकता है।

मनस्कमन्यमनस्कं च विमनस्कमपि यच्चित्तम्।

चिति उदीयते चिति एव विलीयते तच्चित्तम्।।

चित्तं चिद्विजानीयात् त-कार रहितं यदा। 

त-कार विषयाध्यासो विषयविषयिनोः भेदतः।।

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।

तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च।।

***

 

 

 

 


Tuesday, 22 July 2025

28 July 2025

10 O'Clock!

Don't know am or pm,

I S T or G M T, 

But it's said, 

The Moon will go Retrograde.

Obviously,  for a fraction of a second,

For less than 0,001 second.

The Ancient Astrology,

And also the Modern Astronomy, 

Do agree to this.

Either there will be shock, 

That will render all living beings, 

Stunned for that brief moment, 

That would look like an eternity,

When the whole world would stand still, 

Or a part would go through spasms.

And the next moment will be,

An altogether different one, 

When everything would be different. 

Still the chaos and the disturbance,

The turmoil and the incoherence,

Would prevail and rule over. 

A new era would emerge out. 

May be some of us would be 

A witness to this phenomenon! 

***


को ज्ञाता को च दृष्टा!

जनक उवाच :

कथं ज्ञानमवाप्नोति कथं मुक्तिर्भविष्यति।। 

वैराग्यं च कथं प्राप्तं एतद्ब्रूहि मम प्रभु।।१।।

अष्टावक्र उवाच :

किङ्करो न जानाति किं कर्तव्यम्। 

स्वामी न जानाति अहं स्वामी। 

बुद्धिर्न जानाति किं कर्म को कर्ताऽपि

साक्षी पश्यत्येव न करोति किञ्चन्।

-- 


Monday, 21 July 2025

Bitte hören Sie zu!

 सृजनम्  स्रवनम्  श्रवणम्

श्रवण मनन निदिध्यासन 

श्रुति

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काँवडयात्रा 

श्रवण कुमार के माता पिता नेत्रहीन थे और तीर्थयात्रा पर जाना चाहते थे। उस युग में, जिसे सतयुग कहा जाता है, यह मान्यता थी और इसे धर्म भी माना जाता था। वैदिक शिक्षा के अनुसार भी, माता-पिता की सेवा से बड़ा कोई पुण्यकर्म नहीं होता। 

चूँकि श्रवण कुमार के माता-पिता वृद्ध और नेत्रहीन थे , इसलिए श्रवण कुमार ने एक काँवड बनाकर उसके एक पलड़े पर पिता को और दूसरे पर माता को बैठाया और चल पड़े तीर्थयात्रा की उनकी इच्छा पूर्ण करने के लिए। बहुत से विविध तीर्थों की यात्रा पूरी हो जाने पर किसी समय वे विश्राम करने के लिए उस रास्ते पर रुके जो कि वन से होकर गुजरता था। उन्होंने एक सरोवर के किनारे माता-पिता को काँवड से उतारा और वे माता-पिता की प्यास बुझाने के उद्देश्य से जल लेने के लिए सरोवर तक पहुँचे। सरोवर से जल लेने के लिए उन्होंने जल के पात्र को सरोवर में डाला और डुब् डुब् की ध्वनि के साथ जल पात्र में भरने लगा। अभी पात्र आधा ही भरा था कि कहीं से सनसनाता हुआ एक तीर ने उनके हृदय को बेध दिया तो वे अचेत होकर वहीं गिर गए। अभी कुछ ही पल बीते होंगे कि एक नवयुवक वहाँ आ पहुँचा, जो कि कोई और नहीं, बल्कि अयोध्या के राजकुमार दशरथ थे। धनुर्वेद में प्रवीण और शब्दवेधी बाण चलाने में निष्णात। उन्होंने उस अंधेरे में डुब् डुब् का यह शब्द सुना तो उन्हें लगा कि कोई पशु सरोवर से जल पी रहा है। धनुर्विद्या की अपनी क्षमता से गर्व में वे डूबे हुए थे और उस पशु को देखने के लिए वहाँ आए थे जिसे उन्होंने शब्दभेदी बाण चलाकर मार डाला था। किन्तु जैसे ही उन्होंने देखा कि वह कोई पशु नहीं बल्कि उनके ही जैसा या उनसे कुछ कम आयु का नवयुवक था तो उनके तो पैरों तले से धरती खिसक गई। और बाद की कथा तो सभी को विदित ही है।

श्रवण कुमार के माता-पिता भी इस हृदय को विदीर्ण कर देनेवाले आघात को सह न सके और शीघ्र ही उन दोनों ने भी अपने प्राण त्याग दिए। "श्रवण" शब्द श्रु - श्रूयते धातु से बना है जिसका अर्थ है "सुनना" । इससे ही बना एक और शब्द है "श्रुति"। श्रुति का अर्थ है वेद-वाणी। पर्याय से इसलिए वेद की कहा जाता है। अंग्रेजी भाषा का शब्द "hear"   इसी संस्कृत पद श्रु का अपभ्रंश है और यही जर्मन भाषा मे hören  हो जाता है। और इसे "श्रवण" के अपभ्रंश के रूप में भी व्युत्पन्न किया जा सकता है।

The Art Of Listening.

जैसा ऊपर वर्णन किया गया, 'श्रुति' वेद-वाणी का श्रवण है और वेद का अध्ययन पाठ या श्रवण से भी किया जा सकता है। वेदमंत्रों की अर्थात् श्रुति की शिक्षा इस प्रकार से आचार्य द्वारा शिष्य को वाचिक परंपरा से ही दी जाती है, किन्तु फिर इसे लिपिबद्ध भी किया जाने लगा। पुनः,  वाचिक परंपरा से प्राप्त इस शिक्षा को ब्राह्मी (शारदा), नागरी / देवनागरी और श्रीलिपि के अतिरिक्त द्राविड में भी लिपिबद्ध किया जाने लगा। लोक-द्राविड के रूप में  प्राचीनतम तो தமிழ்  भाषा और लिपि ही थी, किन्तु अनेक कारणों से वह वेद-निष्ठ संस्कृत का विकल्प नहीं हो सकती थी। इसलिए भगवान् स्कन्द ने इसके परिष्कृत रूप ग्रन्थलिपि का आविष्कार किया।

वेद-मंत्रों का पाठ और श्रवण भी पात्र और अधिकारी मनुष्य के द्वारा किया जाना चाहिए। अनधिकारी और अपात्र के द्वारा ऐसा किया जाना अनिष्टप्रद होता है। इसीलिए शूद्र वर्ण के व्यक्ति शम्बूक का वध भगवान् श्रीराम के द्वारा किया गया और इसलिए शम्बूक को उत्तम गति और दिव्यप्राप्त की प्राप्ति हुई।

महाकवि कालीदास तृण रघुवंश और भवभूतिकृत उत्तररामचरितम् में भी इस कथा का वर्णन है।

ऐसा एक और उदाहरण कुन्ती का है जिसने अविवाहित अवस्था में ही सूर्य-अथर्वशीर्ष का पाठ सुन लिया और तब उसे संतान के रूप में सूर्य, इन्द्र और वायु इन तीनों देवताओं के पुत्रों को जन्म देना पड़ा था। सूर्यपुत्र कर्ण को तो लोकापवाद के भय से उसका जन्म होते ही नदी  प्रवाहित कर दिया गया था। यम के पुत्र युधिष्ठिर और वायुपुत्र भीम के अतिरिक्त इन्द्र के पुत्र अर्जुन थे।

भवभूतिकृत उत्तररामचरितम् और महाकवि कालीदास तृण रघुवंश में आप

रुद्र, गणपति, देवी, नारायण और सूर्य अथर्वशीर्ष में रुद्र सूर्य, यम, वायु (मातरिश्वा), स्कन्द, अग्नि, प्रणव, वरुण (आपः) और इन्द्र आदि को एक ही परमात्मा के अनेक प्रकारों में वर्णित किया गया है।

श्रावण / सावन में भगवान् शिव पर जलाभिषेक करने के लिए जाते हुए काँवडयात्रियों के बारे में पढ़ते हुए इस पोस्ट को लिखने की प्रेरणा हुई।

नमः शिवाय।। 

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OF BELIEFS.

Rational, Irrational, Inherent and Acquired. पिछले दिनों में  blogger  में अपने सभी खास खास ब्लॉगपोस्ट में विदा कह चुका हूँ, लेकिन लगता है इ...