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Wednesday, 12 October 2022

Theology / वैचारिकी

वैचारिकीय / वैचारिकी
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The Theology :
The artical 'the', the pronouns : 'this', 'that', 'these', 'those' could be traced to have root in the Sanskrit noun word -'धी', and 'लोक', 'लग्'. The two root words together take the form : 'धी-लोकीय' that becomes "Theology".
Other words similar and cognates are from the Sanskrit Root, pronoun-word :
"तत्".
It would not be imprudent if we say that the words "think", "thought" and "thing" are also the developed forms of "धी" / Theo, because they all correctly and exactly too, express the same sense / meaning.
The many ramifications of the Sanskrit word "धी" help us think that "Tao" is also likewise a cognate.
Another word,  -the suffix "logy" may be seen to have roots in the Sanskrit root-words : लोक, लौकिकी, लग्, लग्न ...
which denote "association".
The Sanskrit word, - the root-verbs :
बुध् / बोध / बुध्यते / बोधयति,  धा / धारयति / ध्यै / ध्यायति
form the compound word "बुद्धि", that could be translated in English as "intellect".
There is yet another word "Therm" (in the Greek language?) that too could be seen to have root in the Sanskrit word :
"धर्म / धृ - धारयति".
And the last word is : "temper", that is again from the Sanskrit compound word :
"तं परं।  तत् परं ।"
Thought is the nature of Intellect. 
"nature" could also conveniently, logically be derived from the Sanskrit root-compound word : "नृ चरः"; where "नृ" points out to "नरः" / "पुरुषः", and "चरः" is the noun-form of : "चर् /  चरति".
"Nature" is therefore equivalent of :
"धर्म", while the "तत्परः / तत् परः / तत् परं / तं परं / temper / temperature are synonyms.
What about the word - "religion"?
"re" prefix (Sanskrit : प्र-स्पृश्) points out the sense : "having a prior touch", while "lig" is from the Sanskrit verb-root "लग् / लगति", that has a vast application in varied ways, such as : lag as in 'lag behind', log, lug, lig, luggage, ligature, ligament, leg, legion, .. and so on. 
All point out to the sense "association with".
Therefore "religion", where "re" (Sanskrit -- उपसर्ग -परि) is attached as prefix with the verb "lig" denotes tradition and the ritual.

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There is a prevalent notion about languages.  Which one were the earliest of them?
There are old and new languages because a language is like a river. Keeps moving on and on. 
At least, since the evolution of the mankind.
So there is Prakrit (प्राकृत). The same was then refined and purified and then there was this  Sanskrit language which is not an invented one like any other language that we human speak. The very words Prakrit and Sanskrit have been described in the Sanskrit text like देवी-अथर्वशीर्षम् / deviatharva-Sheersham being the two; - one of them was (पशु भाषा) / pashu-bhasha, that was itself born from nature.  The same was purified, discovered, given the divine status according to the laws inherent there in the scheme of Creation. This follows the phonetics, because sound (संस्कृत - स्वन्, स्वर्, स्वः) is the very foundation of any language.
That is how Sanskrit seems to have been as if programmed in such a way as these days we use a computer-language and create so many apps accordingly, supported by a language.
To conclude, I would like to point out a new aphorism invented by myself. 
"Source is the course".
The two words, - source and course rhyme also. Both could be thought of having the same Sanskrit root-verb -- "सृज्", which in Sanskrit denotes the sense of renouncing, to  leave, giving out. Imperatively this becomes the "creation" also.
For,  in Vedika view, nothing could be made a-new, nor annihilated. 
Law of conservation of "What Is." / सत् .
Unfortunately the same has become "Satan" in the Abrahmic religions.
They pelt the epithet of "Satan" to denounce the idolatry and Sanatana Dharma too.
That has been the irony, farce and injustice to humanity as well. 

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The two fundamental tenets of the Abrahmic religion are basically a diversion from the Sanatana Dharma principles.
One is the concept of mono-theism and the other is the polytheism, and yet another, the concept of idolatry. 
Sanatana Dharma categorically points out to the uniqueness of the God-principle. That is,  there is One and Only One Supreme Reality that governs, maintains the whole existence.
Another, the same Reality is manifest in the myriad forms also.
The word poly-theism implies and points out to the multitude and the plurality of minds.
The word mono-theism means the unity in apparent diversity.

Hope,  some-day for the wellness of humans for Peace and harmony among us, we could reconcile these differences between the two diverse approaches of the Abrahmic and the Sanatana Dharma.

ईशिता सर्वभूतानां सर्वभूतमयंश्च यत्।।
ईशावास्येन निर्दिष्टं यत्पदं नमाम्यहम्।। 

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Sunday, 29 August 2021

The Fabric of the Cosmos.

ब्रह्मसूत्र 

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वन्दे वाणी-विनायकौ

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वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि । 

मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ ।।

लगभग तीन माह पूर्व ब्रह्मसूत्र का अध्ययन कर रहा था ।

संस्कृत शाङ्करभाष्य में,

प्रथम अध्याय, प्रथम पाद, प्रथम अधिकरण के, 

प्रथम सूत्र के प्रारम्भ में भूमिका को पढ़ा,

फिर उसका ही स्वामी गंभीरानन्द द्वारा लिखित अंग्रेजी अनुवाद भी पढ़ा। वैसे गीताप्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित हिन्दी अनुवाद से भी कुछ सहायता प्राप्त हुई।

फिर प्रतीत हुआ कि इसी मूल संस्कृत भाष्य का अपनी अल्प बुद्धि की सहायता से अभ्यास के लिए अनुवाद करना चाहिए।  अतः उपरोक्त के दो पृष्ठ लिखे। 

फिर बहुत दिनों तक उस पर ध्यान नहीं दे पाया। 

आज सुबह, 

'मंतव्य, वक्तव्य और ज्ञातव्य'

कुछ और लिखने के लिए नोट-बुक में स्थान खोज रहा था, कि दोनों पृष्ठ एकाएक सामने आए। यद्यपि उसके तुरंत बाद इसे लिखना अनुपयुक्त न होता, किन्तु फिर सोचा कि उस क्रम को वैसे ही रहने दिया जाए। 

अतः दूसरी नोट-बुक में दूसरा प्रकरण लिखना प्रारंभ किया। इसके बाद ऐसा लगा, कि इन दोनों को साथ रखकर एक नया पोस्ट लिखा जा सकता है।

"Semantics" के लिए हिन्दी में कौन सा शब्द प्रयुक्त होता है, इस बारे में मुझे ठीक से पता न होने से शब्दकोष में खोजने पर वहाँ 'अर्थग्राम' शब्द प्राप्त हुआ। उससे संतुष्टि नहीं हुई।

अभी शाम को फिर सोचा कि इसे पोस्ट में लिखा जाए। 

सामने रखी गोस्वामी तुलसीदास-विरचित श्रीरामचरितमानस पर दृष्टि गई। उसे खोलते ही बालकाण्ड के प्रथम श्लोक पर ध्यान गया और तुरंत याद आया कि

"Semantics"

के लिए जो शब्द मैं सुबह खोज रहा था, वह तो यही है। इसीलिए इस पोस्ट का आरंभ इसी श्लोक से कर रहा हूँ।

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'युष्मद्' प्रत्यय से जिसे मध्यम पुरुष - 'तुम' की तरह जाना जाता है, और 'अस्मत्' प्रत्यय से, जिसे उत्तम पुरुष 'मैं' की तरह जाना जाता है, उनके बीच क्रमशः विषय और विषयी की तरह का, -अंधकार और प्रकाश जैसा मौलिक भेद होता है, अतः उनमें से किसी का भी,  दूसरे से उत्पन्न होना संभव नहीं है। उन दोनों का स्वभाव भी परस्पर अत्यंत भिन्न होने से भी वे अन्योन्याश्रित नहीं हो सकते। इसलिए जिसे 'अस्मत्' प्रत्यय की तरह ग्रहण किया जाता है, उस चेतना अर्थात् विषयी की चेतना पर 'युष्मत्' प्रत्यय रूपी विषय के धर्मों को आरोपित किए जाने को ही अध्यास (superimposition) कहा जाता है। तात्पर्य यही, कि इस  आरोपण का ही नाम 'अध्यास' है। इस प्रकार के त्रुटिपूर्ण अध्यास के ही आधार पर, विषयी के धर्मों को विषयों पर आरोपित किया जाना भी इसी तरह त्रुटिपूर्ण अर्थात् मिथ्या है, ऐसा कहना सर्वथा सुसंगत होगा। 

तथापि दोनों का परस्पर, पारस्परिक अध्यास अर्थात् एक के धर्मों को दूसरे पर आरोपित कर दिया जाना, लोक-व्यवहार में दृष्टव्य और प्रचलित ही है। 

विषय (युष्मत्) / you, तथा विषयी (अस्मत्) / I, - इन दोनों के धर्मों और उन धर्मों के स्वभाववाले तत्वों के इस मिश्रित ज्ञान की (विवेक से) विवेचना करते हुए सत्य एवं असत्य को, जो अहं-इदं तथा मम-इदं के रूप में भी परस्पर अत्यंत भिन्न स्वरूप के हैं, के आधार पर ही हमारा सारा स्वाभाविक लौकिक व्यवहार किया जाता है।

अतः प्रश्न उठता है :

'अध्यास' किसे कहते हैं? 

उत्तर है : 

स्मृति के रूप में अन्यत्र कहीं पहले देखे गए किसी विषय का पुनः स्मरण होना। इसे ही कुछ दूसरे लोग, पहले देखे गए उन विषयों के धर्म का 'अध्यास', अर्थात् (धर्म को) पुनः स्मरण किया जाना कहते हैं।

और कुछ दूसरे लोग, यह कहते हैं कि यह जो 'अध्यास' है, यह विवेक के आग्रह को बाँधनेवाला 'भ्रम' है। 

और कुछ दूसरे लोगों के मतानुसार तो, जहाँ जो 'अध्यास' है, उसके नितांत विपरीत धर्म की कल्पना को ही 'अध्यास' कहा जाता है। (जो भी हो,) किन्तु यह तो स्पष्ट ही है कि इनमें से किसी भी एक के धर्म को दूसरे में सर्वथा यथावत् नहीं पाया जा सकता - अर्थात् विषय और विषयी के,  - युष्मत् और अस्मत् के धर्म परस्पर समान नहीं हो सकते। एक के धर्म में दूसरे के धर्म दिखाई नहीं पड़ते, इसलिए ऐसा आरोपण दोषपूर्ण है। 

लोक (संसार) में भी यही देखा जाता है - सीप (शुक्ति) में रजत की प्रतीति, एक ही चन्द्र (अलग अलग तिथियों में) किसी दूसरे जैसा देखा जाता है। 

फिर,  प्रत्यक्-आत्मा में, विषय में उनके धर्मों का अध्यास कैसे किया जा सकता है? 

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"युष्मदस्मत्प्रत्ययगोचरयोर्विषयविषयिणोस्तमःप्रकाशविरुद्ध- स्वभावयोरितरेतरभावानुपपत्तौ सिद्धायां तद्धर्माणमपि ...

कथं पुनः प्रत्यगात्मन्यविषयेऽध्यासो विषयतद्धर्माणाम् ।"

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(ब्रह्मसूत्र प्रस्तावना, शाङ्करभाष्यम् - समन्वयाध्यायः,

प्रथमाध्याये प्रथमः पादः अधिकरण १, सूत्र १)

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मंतव्य और वक्तव्य 

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क्या विचार के अभाव में संबंध होता है? 

क्या संबंध के अभाव में विचार होगा है? 

जिसका भी विचार होता है, उससे ही संबंध होता है, ओर जिससे संबंध होता है उसका ही विचार भी होता ही है।

विचार है वक्तव्य, संबंध है वस्तुस्थिति। 

वक्तव्य भाषा पर आश्रित होता है इसलिए विचार भी भाषा की ही उत्पत्ति है। 

क्या भाषा के अभाव में वक्तव्य हो सकता है? 

क्या वक्तव्य के अभाव में विचार हो सकता है? 

किन्तु फिर भी, संबंध होने पर वक्तव्य की संभावना हो सकती है। इसी प्रकार भाषा के होने पर वक्तव्य जो शाब्दिक रूप ग्रहण कर लेता है, उसे विचार कहा जाता है। 

इसलिए एक से अधिक मनुष्यों के बीच वक्तव्य के संप्रेषण के साधन की तरह विचार महत्वपूर्ण होता है। विचार किसी भौतिक वस्तु के विषय में तो अपने मंतव्य को वक्तव्य का रूप प्रदान कर सकता है, किन्तु जहाँ किसी भाववाचक वस्तु के विषय में कोई मंतव्य होता है, वहाँ विचार संप्रेषण हो पाने के लिए अपर्याप्त हो सकता है। उदाहरण के लिए भूख, प्यास, निद्रा, जागृति, भय, राग, क्रोध, ईर्ष्या, लोभ, सुरक्षा, चिन्ता आदि जैसी भाववाचक वस्तुओं  के लिए जो शब्द चुने जाते हैं वे किसी अर्थ के द्योतक होते हैं, जिसे संप्रेषित करना आसान होता है, और उस अर्थ को ग्रहण करने में कोई कठिनाई भी नहीं होती। इस प्रकार मंतव्य से वक्तव्य, वक्तव्य से भाषा, तथा भाषा से विचार का उद्भव होता है। किन्हीं दो मनुष्यों के बीच संवाद या बातचीत के लिए विचार उपयोगी है, इसमें संदेह नहीं, किन्तु मनुष्य में विचार की स्मृति से ही जो वैचारिक गतिविधि प्रारंभ होती है, वह भी दो प्रकारों से हो सकती है : प्रथम प्रकार में, विचार स्मृति से ही प्रकट होकर पुनः स्मृति में ही विलीन हो जाता है। दूसरे प्रकार की गतिविधि में विचार जिस विषय के संबंध में होता है, उस विषय पर ध्यान दिया जाता है, और तब विचार की गतिविधि विवेचनात्मक होती है । किन्तु इस स्थिति में भी, पुनः विषय-परक अथवा स्व-परक हो सकती है। विषय-परकता क्या है इसे तो सभी जानते ही हैं, किन्तु स्वपरकता क्या है इस बारे में ऐसा कहा जा सकता है कि इसके भी पुनः दो विशिष्ट भेद हैं : 

एक है, -व्यावहारिक धरातल पर अपने आभासी अनित्य स्व को एक विषय की तरह ग्रहण करते हुए, उस स्व के बारे में होनेवाली विचार की विवेचनात्मक गतिविधि,

दूसरी है, -आत्मा क्या है, इस प्रश्न के उत्तर को खोजने, जानने की उत्कंठा से उत्स्फूर्त होकर प्रारंभ होनेवाली, अपने स्वरूप की वह जिज्ञासा, जो विचार-मात्र का,और अंततः वैचारिकता का भी अतिक्रमण कर जाती है।

इस प्रकार विचार एकाधिक मनुष्यों के बीच विचार विनिमय का  साधन हो सकता है, या अपने ही भीतर अपने होने के तात्पर्य के बोध का साधन भी हो सकता है।

विषय-परक विचार अनिवार्यतः और सदैव ज्ञात की सीमा में ही बँधा होता है, जहाँ 'नए' के आविष्कार की न तो कोई संभावना, और न ही कोई कारण या प्रेरणा होती है । यदि कुछ नया प्राप्त होता हुआ प्रतीत होता भी है तो वह ज्ञात- का ही नया संस्करण भर होता है और ज्ञात से सीमित होता है। यह ज्ञात, अवश्य ही तथाकथित वैज्ञानिक (logical / rational) आधार पर की गई कोई विवेचना हो सकता है, किन्तु यह भी केवल उन्हीं तथ्यों का पुनरुद्घाटन मात्र होता है, जिन्हें अब तक 'अज्ञात' की कोटि में रखा गया था। इसलिए विज्ञान समस्त ज्ञात / ज्ञान को नियमों, परिभाषाओं की सीमा तक ही निर्धारित और सुनिश्चित कर पाता है। वह उन नियमों का आविष्कार तो करता है, किन्तु वे नियम अस्तित्व में क्यों हैं, इसका कोई संतोषजनक कारण इंगित नहीं कर पाता।

विज्ञान, क्या कभी 'ज्ञाता' (के स्वरूप) के विषय में सुनिश्चित रूप से कुछ परिभाषित कर पाता है? 

ज्ञाता तो स्पष्ट ही यही है जिसे 'स्व' कहा जाता है। 

वस्तुतः क्या 'स्व' का यह तत्व ही 'ज्ञाता' नहीं है?

विचार के अभाव में संबंध नहीं हो सकता। 

संबंध के अभाव में विचार भी नहीं हो सकता। 

भौतिक वस्तुओं के बारे में तो यह सत्य है ही, भाववाचक या भावनात्मक, भावपरक वस्तुओं के बारे में भी यही सत्य है। 

स्पष्ट है कि ज्ञाता के ही भौतिक स्थूल, इन्द्रियग्राह्य वस्तुओं से,  और भावपरक, सूक्ष्म बुद्धिग्राह्य वस्तुओं से संबंधित होने पर ही तत्संबंधित विचार का आगमन होता है। 

ज्ञाता, क्या अपने आप से पृथक्, अथवा विच्छिन्न होता है, या ज्ञाता क्या कभी अपने आप के बारे में विचार (का प्रयोग) कर भी सकता है? 

यदि यह प्रश्न तर्कसंगत हो भी, तो भी इस प्रश्न का उत्तर इसी प्रश्न में ही छिपा है ।

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OF BELIEFS.

Rational, Irrational, Inherent and Acquired. पिछले दिनों में  blogger  में अपने सभी खास खास ब्लॉगपोस्ट में विदा कह चुका हूँ, लेकिन लगता है इ...