Friday, 14 October 2022

है और होना चाहिए!

एक रोचक उद्धरण

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"जो मनुष्य यह जानता है कि वह क्या है, वह यह भी जान लेता है कि उसे क्या होना चाहिए!"

सामान्यतः यह तर्कसंगत प्रतीत होता है। 

जो मनुष्य यह जानता है कि वह पुरुष है या स्त्री है, बालक या बालिका है, किसी का पिता, भाई, माता या बहन, पुत्र या पुत्री है, बुद्धिमान है या मूर्ख है, शक्तिशाली है या दुर्बल, स्वस्थ है या अस्वस्थ है, वह यह भी जान लेता है कि उसे क्या होना चाहिए! जैसे कि एक सच्चरित्र और कर्तव्यपरायण पुरुष, स्त्री, छात्र या छात्रा, पिता या भाई, माता या बहन, पुत्र या पुत्री, बुद्धिमान या मूर्ख, शक्तिशाली या दुर्बल, स्वस्थ या अस्वस्थ, आदि।

इस दृष्टि से संसार में प्रायः प्रत्येक मनुष्य अपने आपको जान लेने पर यह भी जान ही लेता है कि उसे क्या होना चाहिए। इस प्रकार से पहले अपने आपको जानना आवश्यक है, किन्तु कुछ मनुष्य जब इतना भी नहीं जानते कि वे क्या हैं, तो उनके लिए यह जान पाना और भी दूर की बात होता है कि उन्हें क्या होना चाहिए! वे लगभग किसी पशु जैसा जीवन ही जीते हुए, उनकी बुद्धि और दूसरी क्षमताओं आदि का जितना विकास हुआ होता है, उसी तल पर जीवन व्यतीत करते रहते हैं। सामाजिक और सांसारिक रूप से वे बहुत सफल, सुखी या दुःखी हो सकते हैं, और चिन्ताओं से ग्रस्त या निश्चिन्त रहने के आदी हो जाते हैं। वे किसी भी प्रकार से उनके सामने आई स्थितियों का सामना भी कर लेते हैं।

किन्तु उनके जीवन में तब एक परिवर्तनकारी मोड़ आ जाता है, जब वे यह जान लेते हैं कि वे क्या हैं। पुनः यह भी उनकी बुद्धि के विकास पर ही निर्भर होता है, और तदनुसार ही वे यह भी जानने लगते हैं कि उन्हें क्या होना चाहिए। इसका मतलब यह नहीं कि उनका चरित्र ओर आचरण बदल ही जाता हो। यह भी हो सकता है, कि वे क्या हैं इसे जान लेने के बाद उनका चरित्र या आचरण बदले या न भी बदले। यदि वे सज्जन हैं तो सज्जन ही रहेंगे और दुर्जन हैं तो दुर्जन ही बने रहेंगे, यदि सच्चरित्र हैं तो सच्चरित्र ही बने रहेंगे और यदि ऐसे नहीं हैं तो यह हो सकता है कि वे वैसे ही बने रहें।

उनके जीवन में पुनः यहाँ एक और मोड़ आ सकता है, जब वे यह भी जान लेते हैं कि वे क्या हैं। यदि उनका ध्यान इस पर जाता है, कि वे एक अच्छे मनुष्य हैं या नहीं तो उनके जीवन में अनायास ही ऐसा रूपान्तरण हो जाता है कि वे अच्छा बनने का प्रयत्न कर सकते हैं ।

उनके जीवन में पुनः यहाँ एक और मोड़ आ सकता है, जब वे केवल बौद्धिक दृष्टि से नैतिक आदर्शों और मूल्यों का आकलन कर, सामाजिक और व्याहारिक दृष्टि से, केवल ऊपरी तौर पर अच्छे होने का प्रयत्न करने लगते हैं या वस्तुतः इन मूल्यों और आदर्शों को अपने हृदय से भी स्वीकार कर पाते हैं। या वे बस ऐसा सुविधाजनक जीवन जीने लगते हैं जिसमें छल, कपट और पाखंड होता हो, और वे उसके प्रति अपनी आँखें बंद ही रखते हैं। 

उनके जीवन में पुनः यहाँ एक और मोड़ आ सकता है, जब वे उन मूल्यों और आदर्श पर चल पाने में कठिनाई अनुभव करने लगते हैं और अन्तर्द्वन्द से ग्रस्त होने लगते हैं। हो सकता है तब उनमें अपराध-बोध पनपने लगे या वे कठोरतापूर्वक अपराध की इस भावना को दबा दें और अपने लक्ष्य और महत्वाकांक्षा को महत्वपूर्ण मानकर संकल्प कर लें कि उन्हें क्या होना चाहिए। 

हर मनुष्य के ही जीवन की राह में यद्यपि ऐसे सभी मोड़ आते और आ सकते हैं, किन्तु वे ही, जो जानते हैं कि वे क्या हैं, इसे भी जान पाते हैं कि उन्हें क्या होना चाहिए।

अब इस प्रश्न को दूसरे तरीके से इस रूप में सामने रखा जाए :

जो मनुष्य यह जानता है कि वह कौन है, उसके लिए यह प्रश्न ही संभव नहीं है कि उसे क्या होना चाहिए। किन्तु कोई अत्यन्त बिरला ही कभी कभी यह जान पाता है कि वह कौन है, जबकि  अधिकांश लोगों के मन में यह प्रश्न न तो कभी उठता है न उठ ही पाता है। यह प्रश्न उनके मन में इसलिए भी नहीं उठ पाता है, क्योंकि उन्हें इस बारे में ऐसा कोई संदेह तक कभी नहीं होता, यह संदेह कि क्या वे नहीं जानते हैं कि वे कौन हैं!

किन्तु किसी किसी अत्यन्त ही बिरले मनुष्य में जिज्ञासा के रूप में प्रारंभ में यह प्रश्न तब उठता है जब वह संसार में नित्य कुछ है या नहीं, और यदि सब कुछ अनित्य है, तो इस अनित्य संसार को जाननेवाला "मैं" भी ऐसी ही एक अनित्य वस्तु है? तब उसे यह दिखाई देता है कि यदि "मैं" भी अनित्य हूँ, तो यह जीवन, यह संसार और यह सब क्या है! अनुभव और स्मृति से भी उसे यही स्पष्ट होता है कि इस अनित्य को जाननेवाला अकाट्य रूप से, असंदिग्ध रूप से कोई नित्य वस्तु है, और वह नित्य वस्तु है,  निजता का और अपने होने का सहज, अपने अनायास, सतत  रहनेवाला भान। जो संसार की दूसरी सभी वस्तुओं जैसी कोई अनित्य वस्तु नहीं हो सकता। 

किन्तु इस स्थिति को प्राप्त करनेवाला यह भी अवश्य ही जान लेता है कि यद्यपि इस नित्य वस्तु का वर्णन किया जाना संभव नहीं है, किन्तु यही एकमात्र अविनाशी वास्तविकता है।

यह "मैं" हूँ या नहीं, - ऐसा कहने का कोई महत्व भी क्या है!

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