Thursday, 12 March 2026

OF BELIEFS.

Rational, Irrational, Inherent and Acquired.

पिछले दिनों में  blogger  में अपने सभी खास खास ब्लॉगपोस्ट में विदा कह चुका हूँ, लेकिन लगता है इस ब्लॉग में अभी कुछ लिखा जा सकता है। इसलिए यह

अंतिम पोस्ट!

सनातन धर्म के माननेवाले अधिकांश लोग यह मानते हैं कि धर्म और अधर्म की पहचान की सर्वाधिक प्रामाणिक कोई कसौटी यदि है तो वह श्रीमद्भगवद्गीता ही  है।

संक्षेप में गीता की विषय-वस्तु और सार-कथा यह है -

कुरुक्षेत्र में महाभारत के युद्ध के प्रारंभ में युधिष्ठिर के छोटे भाई अर्जुन उनके मित्र और उनके रथ के सारथी श्रीकृष्ण के साथ रणक्षेत्र में पहुँचे तो अत्यंत भावविह्वल हो उठे। भले ही दुनिया भर के राजनेता न देख सकें, मूढ से मूढ और अत्यन्त मूर्ख कहे जानेवाले व्यक्ति के लिए भी यह समझ सकना आसान है कि युद्ध  कितनी बड़ी और भयावह, अंतहीन और अमानवीय त्रासदी है, और इससे पूरी दुनिया ही तबाह हो सकती है। और फिर युद्ध में उनके सामने वे ही सब लोग थे,  - उनके कुल और परिवार के उनके प्रिय लोग जो अपने

कर्तव्य से प्रेरित होकर अपने प्राणों की बलि दे देने के लिए और अपने सामने खड़े प्रतिद्वंद्वी के प्राण लेने के लिए कमर कस कर तैयार खड़े थे।

अर्जुन इस सामूहिक, निरर्थक आत्महत्या की विडम्बना को देख रहा था और यद्यपि उसे अपने जीवन और प्राणों की रंचमात्र भी चिन्ता नहीं थी, लेकिन उन अपने लोगों की चिन्ता से वह बहुत व्याकुल हो उठा था। वह तो कह रहा था कि अपने स्वजनों की हत्या कर उनके खून से सिक्त राज्य और भूमि का उपभोग करने से बेहतर तो यही होगा कि भिक्षा से जीवन बिताकर अपनी आयु पूरी कर ली जाए, या यदि वे चाहें तो मुझ निःशस्त्र को ही मार डालें।

तब श्रीकृष्ण ने उन्हें उनकी इस दुविधा के बारे में यह स्पष्ट किया कि तुम्हारे अकेले के जीने या मर जाने से युद्ध को टाला जाना संभव नहीं है। क्योंकि मनुष्य की सामूहिक मानसिकता ही मनुष्य की सामूहिक नियति है और इसलिए तुम जीते रहो या मर जाओ, दूसरे लोगों के लिए इसका कोई महत्व नहीं है। और तुम जो स्वयं अपने आपको स्वतंत्र कर्ता मान रहे हो यह भी तुम्हारा बहुत बड़ा वहम है। क्योंकि औरों की ही तरह तुम भी समष्टि  प्रकृति का एक यंत्रमात्र हो और प्रकृति ही तुम्हें बलपूर्वक उस कार्य में संलग्न कर देगी जिसे तुम चाहकर या न चाहते हुए भी करोगे ही। 

श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 2 के 9 वें और अध्याय 18 के 59 वें निम्नलिखित दो श्लोकों में इस ग्रन्थ की पूरी कथा इस प्रकार से वर्णित है -

एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप।

न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह।।९।।

और,

यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे।

मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति।।५९।।

अध्याय 2 से अध्याय 17 तक श्रीकृष्ण निष्ठा और श्रद्धा क्या है इस बारे में विवेचना करते हैं। और आगे कहते हैं कि किसी भी मनुष्य के मन में मौलिक द्वन्द्व भाग्य और कर्म के संबंध में होता है। यद्यपि भाग्य का अर्थ है नियति - वह सब जो कि घटित होता है लेकिन कर्म वह उपाय है जो मनुष्य के हाथ में होता है जिसकी सहायता से शायद वह अपने भाग्य को बदल सकता है।

मनुष्य की इन दोनों मान्यताओं को ही निष्ठा कहा जाता है। इस बीच समष्टि-अस्तित्व के किसी नियामक और नियंता के अस्तित्वमान होने या न होने की मान्यता जन्म लेती है जिसे विश्वास  या कल्पनामात्र समझा जाता है। इस नियामक और नियंता को ही ईश्वर या ऐसा ही कोई अन्य नाम दिया जाता है। जो इस प्रकार के किसी ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास करते हैं उन्हें आस्तिक, और जो ऐसे किसी ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास नहीं करते उन्हें नास्तिक या संदेहवादी कहा जाता है। शायद अज्ञेयवाद भी संदेहवाद का ही एक और प्रकार है।

इन सभी विभिन्न मान्यताओं पर विश्वास करनेवाले यह तो मानते ही हैं कि यह संसार सत्य है क्योंकि संसार को ही असत्य कह दिए जाने पर तो कोई प्रश्न ही नहीं पैदा हो सकता है। तो फिर भी यह प्रश्न कि

सत्य क्या है? और इसे कैसे तय / परिभाषित किया जाए?

तो कुछ लोगों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि अधिकांश लोगों के लिए जीवन के तात्कालिक विषय और उनसे संबंधित प्रश्न अधिक महत्व रखते हैं। ईश्वर का होना या न होना तभी महत्वपूर्ण होता है जब ऐसा कोई ईश्वर वास्तव में किसी रूप में अनुभवगम्य भी हो। केवल अनुमानगम्य ईश्वर किस प्रकार हमारे किसी काम का हो सकेगा?

फिर कुछ लोग आत्मा नामक वस्तु को ही नित्य सत्य की तरह प्रत्यक्ष (Direct) और अपरोक्ष (im-mediate) बोधगम्य प्रमाण मानते हैं क्योंकि अपने अस्तित्व को हर कोई अनिवार्य और अपरिहार्य रूप से स्वीकार करता ही है और इसे हर कोई अनायास जानता भी है।

सांख्य दर्शन में इसी आधार पर पुरुष और प्रकृति को नित्य सत्य कहा जाता है। यही पुरुष "मैं" है जबकि प्रकृति "यह" है।

इस दर्शन में भी ईश्वर के होने या न होने का प्रश्न गौण और अप्रासंगिक भी हो जाता है इसलिए इसे कभी कभी "नास्तिक" दर्शन भी कह दिया जाता है। जिस चेतना में ये दोनों तत्व - पुरुष और प्रकृति अभिव्यक्त होते हैं और फिर विलीन भी होते रहते हैं, वह तत्व विषय-विषयी से विलक्षण है, बस इतना ही कह सकते हैं। वही वह ज्ञान है जिसमें पुरुष-प्रकृति का भेद नहीं रह जाता क्योंकि उसी ज्ञान में सब व्याप्त है और वही हममें व्याप्त है।

ईश्वर के अस्तित्व और महत्व को स्वीकार करनेवाले और अस्वीकार करनेवाले भी "मैं" क्या वस्तु है इस प्रकार की किसी वस्तु के अस्तित्व को मानते तो हैं और शायद उसे ही अहंकार या  ego  कहते हैं, किन्तु न तो उसे इंगित कर सकते हैं, और न ही उस वस्तु का विषयीकरण / objectification ही कर सकते हैं। तो  फिर किसी आत्मा या ईश्वर का विषयीकरण / objectification करना तो उनके लिए नितान्त असंभव ही है।

गीता में पुनः दो प्रकार की भाग्य और कर्म की निष्ठा के बारे में कहा गया जो हर किसी की बुद्धि को प्रेरित और संचालित करती है। और निष्ठा के अनुसार ही मनुष्यमात्र में प्रकृति के ही तीनों गुणों और उनके मिश्रण के अनुरूप सात्विक, राजसिक और तामसी गुणों से युक्त उसकी श्रद्धा होती है।

यह थोड़ा विचित्र है कि मनुष्य में किसी भी प्रकार की निष्ठा हो, किसी भी प्रकार की श्रद्धा हो, वह ईश्वरवादी या निरीश्वरवादी हो, भौतिकवादी, मनोविज्ञानवादी या अध्यात्मवादी हो, अपनी प्रकृति से परिचालित होता है।

दो दिनों पहले ही इस पर ध्यान गया कि हिंदी "मैं" के लिए प्रयुक्त तमिल् शब्द 

நான் और ஞாறம்

एक ही वास्तविकता "आत्मा" (स्व या स्वयं अपने-आप के ही लिए प्रयुक्त किए जाते हैं।

इसी प्रकार "तुम" के लिए प्रयुक्त तमिल् शब्द है -

நி

अहं ब्रह्मास्मि और तत् त्वम् असि

इसी सत्य का उद्घोष करते हैं। 

Bye! 

👋 

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